रमेश एक छोटा सा दुकानदार था, जो अपनी परचून की दुकान पर दिन-रात मेहनत करता था। उसकी दुकान के पीछे एक छोटा सा गोदाम था, जहां वह सामान रखता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से रमेश की नींद उड़ गई थी। कारण था एक शरारती बिल्ली, जिसे रमेश "बिल्ला राजा" कहता था।
बिल्ला राजा हर रात गोदाम में घुसकर राशन के बोरे काट देता और चावल, दाल या बिस्कुट खा जाता। रमेश ने कई बार उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन बिल्ला राजा इतना तेज और चालाक था कि हर बार बच निकलता।
एक दिन रमेश ने ठान लिया कि अब बिल्ला राजा को सबक सिखाना ही पड़ेगा। उसने गोदाम के कोने में चावल का एक कटोरा रखा और उसके पास एक पिंजरा लगा दिया। रमेश सोचने लगा, "आज यह बिल्ली पकड़ी ही जाएगी।"
रात हुई। रमेश छिपकर देखने लगा। थोड़ी देर बाद बिल्ला राजा आया। उसने चावल की खुशबू सूंघी और मुस्कुराया, जैसे उसने रमेश की चाल को समझ लिया हो। बिल्ला राजा ने पिंजरे की तरफ देखा, और फिर बड़ी चालाकी से कटोरे को पिंजरे के बाहर खींच लिया। रमेश यह देखकर दंग रह गया।
अगले दिन रमेश ने दूसरा जाल लगाया। उसने चावल के साथ बिस्कुट भी रखा, लेकिन इस बार कटोरे के नीचे एक पतला धागा बांधा, जो पिंजरे से जुड़ा था। रमेश ने सोचा, "अब देखता हूँ ये कैसे बचता है।"
रात में बिल्ला राजा फिर आया। उसने पहले कटोरे का निरीक्षण किया। जैसे ही उसने बिस्कुट उठाया, पिंजरा गिरने वाला था। लेकिन बिल्ला राजा ने अपनी पूंछ से धागा खींचा और पिंजरे को गिरने से रोक लिया। वह अपना भोजन उठाकर आराम से भाग गया।
रमेश अब पूरी तरह हार चुका था। उसने सोचा, "यह बिल्ली मुझसे ज्यादा चालाक है। इसे हराना मुश्किल है।"
अगले दिन रमेश ने गोदाम के कोने में एक कटोरा भरकर रखा, लेकिन इस बार उसने कोई जाल नहीं लगाया। उसने दीवार पर लिखा: बिल्ला राजा के लिए।
रात में बिल्ला राजा आया और कटोरे को देखा। उसने रमेश को झरोखे से झाँकते हुए देखा और धीरे-धीरे कटोरे से खाने लगा। रमेश हँस पड़ा और बोला, "अगर तुम मेरी चालाकी नहीं समझ सकते, तो मैं तुम्हारी दोस्ती क्यों न मान लूँ?"
उस दिन के बाद, रमेश और बिल्ला राजा के बीच एक समझौता हो गया। बिल्ला राजा दुकान का पहरेदार बन गया, और बदले में रमेश उसे रोज थोड़ा-सा खाना देने लगा।
"कभी-कभी लड़ाई जीतने से ज्यादा जरूरी है समझदारी से रिश्ता बनाना।"
No comments:
Post a Comment