कहते हैं, बरसों पहले जब यह पेड़ छोटा था, एक बूढ़ा साधु गाँव आया था। उसने कहा था, "यह पेड़ सिर्फ उन लोगों के लिए है जो सच्चे दिल से कुछ मांगते हैं। जो भी इसके नीचे अपनी सच्ची मंशा के साथ बैठेगा, उसकी इच्छा पूरी होगी।"
इस बात को सुनकर गाँव के लोग समय-समय पर पेड़ के नीचे अपनी परेशानियां लेकर आते। किसी की फसल खराब हो जाती, किसी के घर में झगड़े होते, तो कोई अपने खोए हुए सपनों को फिर से पाना चाहता। पेड़ के नीचे बैठने वालों में से कई लोगों ने कहा कि उनकी समस्याओं का हल मिल गया।
एक दिन गाँव में एक युवक, अर्जुन, शहर से लौटा। वह पढ़ा-लिखा और आधुनिक सोच वाला था। उसने इस पेड़ की कहानी को महज अंधविश्वास मानकर हँसी में उड़ा दिया। उसने गाँववालों को समझाने की कोशिश की कि उनकी समस्याएं उनकी मेहनत और सोच से हल होती हैं, न कि किसी पेड़ के नीचे बैठने से।
लेकिन अर्जुन की माँ, जिसे लंबे समय से अपनी खोई हुई बेटी की चिंता थी, हर रोज पेड़ के नीचे जाकर प्रार्थना करती थीं। अर्जुन को यह सब बेमतलब लगता था।
एक दिन, जब अर्जुन की माँ बीमार पड़ीं, तो उसने पहली बार पेड़ के नीचे जाकर बैठने का फैसला किया। उसने मन ही मन कहा, "अगर यह पेड़ सच में किसी की सुनता है, तो मेरी माँ ठीक हो जाएं और उनकी खोई हुई बेटी वापस मिल जाए।"
अर्जुन को यकीन नहीं हुआ, लेकिन उसने पहली बार महसूस किया कि आस्था और विज्ञान के बीच एक गहरा रिश्ता है, जिसे समझने के लिए सिर्फ तर्क नहीं, बल्कि दिल की आवाज़ भी जरूरी होती है।
गुलमोहर का पेड़ फिर से गाँववालों की उम्मीदों का केंद्र बन गया। अर्जुन अब हर सुबह वहाँ बैठता, लेकिन इस बार अपनी माँ के साथ, पेड़ की छांव में, अपने दिल की बात कहने।
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